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Saturday, 27 February 2016

Kala Bhairava Ashtakam कालभैरवाष्टकम्


Kala Bhairava Ashtakam  

देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपंकजं । व्यालयज्ञसूत्रमिंदुशेखरं कृपाकरम् ॥  

नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगंबर । काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥१॥ 


भानुकोटिभास्वरं भावाब्धितारकं परं । नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम् ॥ 
कालकालमम्बुजाक्षमक्षशूलमक्षरं । काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥२॥ 

शूलटंकपाशदण्डपाणिमादिकारणं । श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम् ॥ 
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रतांडवप्रियं । काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥३॥ 

भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तलोकविग्रहं । भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहं । 
विनिक्कणन्मनोज्ञहेमकिंकिणीलसत्कटिं । काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥४॥ 

धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशकं । कर्मपाशमोचकं सुशर्मदायकं विभुं ॥ 
स्वर्णवर्णशेषपाशशोभितांगमण्डलं । काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥५॥ 

रत्न५पादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं । नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरंजनम् ॥ 
मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणं । काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥६॥ 

अट्टाहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसंततिं । दृष्टिपातनष्टपापजालमुग्रशासनं ॥ 
अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं । काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥७॥ 

भूतसंघनायकं विशालकीर्तिदायकं । काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुं ॥ 
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं । काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥८॥ 

कालभैरवाष्टकं पठन्ति ये मनोहरं । ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनं ॥ 
शोकमोहदैन्यलोभकोपतापनाशनम् । प्रयान्ति कालभैरवांघ्रिसन्निधि नरा ध्‍रुवम् ॥९॥ 



भैरव के आठ रूप भी अधिक लोकप्रिय हैं- 1.असितांग भैरव, 2. रु-रु भैरव, 3. चण्ड भैरव, 4. क्रोधोन्मत्त भैरव, 5. भयंकर भैरव, 6. कपाली भैरव, 7. भीषण भैरव तथा 8. संहार भैरव।  

'महा-काल-भैरव' मृत्यु के देवता हैं। 'स्वर्णाकर्षण-भैरव' को धन-धान्य और संपत्ति का अधिष्ठाता माना जाता है, तो 'बाल-भैरव' की आराधना बालक के रूप में की जाती है। सद्-गृहस्थ प्रायः बटुक भैरव की उपासना ही करते हैं, जबकि श्मशान साधक काल-भैरव की। 

बटुक भैरवजी तुरंत ही प्रसन्न होने वाले दुर्गा के पुत्र हैं। बटुक भैरव की साधना से व्यक्ति अपने जीवन में सांसारिक बाधाओं को दूर कर सांसारिक लाभ उठा सकता है। 
धार्मिक पुराणों एवं शास्त्रों के अनुसार मार्गशीर्ष (अगहन) मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी का बहुत महत्व  है। यह दिन कालभैरव अष्टमी के नाम से प्रसिद्ध है। इस दिन मध्याह्न में भगवान शंकर के अंश से भैरव  की उत्पत्ति हुई थी अतः इस तिथि को काल-भैरवाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है।  
भैरव की पूजा में दिनों के अनुसार 'दैनिक नैवेद्य'। रविवार को चावल-दूध की खीर। सोमवार को मोतीचूर के लड्डू। मंगलवार को घी-गुड़ अथवा गुड़ से बनी लापसी या लड्डू। बुधवार को दही-बूरा। गुरुवार को बेसन के लड्डू। शुक्रवार को भुने हुए चने। शनिवार को तले हुए पापड़, उड़द के पकौड़े या जलेबी का भोग लगाया जाता है। 
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Tuesday, 16 February 2016

Shiva Tandava Stotram शिव-ताण्दव स्तोत्रम् (रावण-कृत)


जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥१॥

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी_
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्धगज्जलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्‍भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥४॥

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर_
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥५॥

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा_ 
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः ॥६॥

करालभालपट्टिकाधगद्‍धगद्‍धगज्ज्वलद्_
धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥७॥

नवीनमेघमण्डली निरुद्‍धदुर्धरस्फुरत्_
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः ।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः ॥८॥

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा_
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥९॥

अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी_
रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम् ।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्‍भुजङ्गमश्वसद्_
विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल_
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्_
गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥१२॥

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् ।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन्कदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम् ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥१४॥

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः
शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥१५॥

इति श्रीरावण - कृतम् शिव - ताण्दव स्तोत्रम् सम्पूर्णम्
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Wednesday, 3 February 2016

गणपति अथर्वशीर्ष Ganapati Atharvashirsha Shri Ganesh Atharvashirsha




।। श्री गणेशाय नम: ।। 
(शान्ति-मन्त्र:)
ॐ भद्रं कर्णेभि शृणुयाम देवा:। भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा:।।
स्थिरै रंगै स्तुष्टुवां सहस्तनुभि:। व्यशेम देवहितं यदायु:।1।
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा:। स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा:। 
स्वस्ति न स्तार्क्ष्र्यो अरिष्ट नेमि:।। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।2।
ॐ शांति:। शांति:।। शांति:।।

।अथ अथर्वशीर्षारम्भ: ।
ॐ नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि।
त्वमेव केवलं कर्ताऽसि। त्वमेव केवलं धर्ताऽसि।
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि। त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।
त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम्॥१॥ 
ऋतं वच्मि । सत्यं वच्मि॥२॥
अव त्वं मां। अव वक्तारं।
अव श्रोतारं। अव दातारं।
अव धातारं। अवानुचानमव शिष्यं।
अव पश्चात्तात्। अव पुरस्तात्। अवोत्तरात्तात्। अव दक्षिणात्तात्।
अव चोर्ध्वात्तात। अवाधरात्तात। सर्वतो मां पाहि पाहि समंतात्॥३॥
त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मय:। त्वमानंदमयस्त्वं ब्रह्ममय:।
त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽसि। त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि॥४॥
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते। सर्वं जगदिदं तत्त्वस्तिष्ठति।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति। सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभ:। त्वं चत्वारि वाक्पदानि॥५॥
त्वं गुणत्रयातीत:। त्वमवस्थात्रयातीत:। त्वं देहत्रयातीत:। त्वं कालत्रयातीत:।
त्वं मुलाधारस्थितोऽसि नित्यं। त्वं शक्तित्रयात्मक:। त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं। 
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्तवं रुद्रस्त्वं इंद्रस्त्वं अग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं
ब्रह्मभूर्भुव:स्वरोम्॥६॥
गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं।
अनुस्वार: परतर:। अर्धेन्दुलसितं।
तारेण ऋध्दं। एतत्तव मनुस्वरूपं।
गकार: पूर्वरुपं। अकारो मध्यमरूपं।
अनुस्वारश्चान्त्यरुपं। बिन्दुरुत्तररुपं।
नाद: संधानं। स हिता संधि:।
सैषा गणेशविद्या:। गणक ऋषि:।
निचृद्वायत्रीच्छंद:। गणपतिर्देवता।
ॐ गं गणपतये नम:॥७॥
एकदंताय विद्महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दंती प्रचोदयात्॥८॥
एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम्।
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।
रक्तगंधानुलिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्।
भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।
आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृते: पुरुषात्परम्।
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर:॥९॥
नमो व्रातपतये। नमो गणपतये।
नम: प्रमथपतये। नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय।
विघ्ननाशिने शिवसुताय।
श्रीवरदमूर्तये नमो नम:॥१०॥

फलश्रुति
एतदथर्वशीर्षं योऽधिते।
स ब्रह्मभूयाय कल्पते।
स सर्वत: सुखममेधते।
स सर्वविघ्नैर्नबाध्यते।
स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते॥
सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।
सायंप्रात: प्रयुंजानो अपापो भवति।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।
धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति॥
इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्।
यो यदि मोहाद्दास्यति।
स पापीयान् भवति।
सहस्त्रावर्तनात् यं यं काममधीते
तं तमनेन साधयेत्॥११॥
अनेन गणपतिमभिषिंचति।
स वाग्मी भवति।
चतुर्थ्यामनश्नन् जपति।
स विद्यावान् भवति।
इत्यथर्वणवाक्यं।
ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्।
न बिभेति कदाचनेति॥१२॥
यो दूर्वांकुरैर्यजति।
स वैश्रवणोपमो भवति।
यो लार्जैर्यजति स यशोवान् भवति।
स मेधावान् भवति।
यो मोदकसहस्त्रेण यजति।
स वाञ्छितफलमवाप्नोति।
य: साज्यसमिभ्दिर्यजति।
स सर्वं लभते स सर्वं लभते॥१३॥
अष्टौ ब्राह्मणान् समम्यग्ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति।
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ वा जप्ता सिध्दमंत्रो भवति।
महाविघ्नात्प्रमुच्यते।
महादोषात्प्रमुच्यते।
महापापात् प्रमुच्यते।
स सर्वविद्भवति स सर्वविद्भवति।
य एवं वेद इत्युपनिषद्॥१४॥
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श्रीरामचरित मानस Ram Charit Manas रामायण पारायण विधि Ramayan parayan Vidhi श्री राम शलाका प्रश्नावली Shree Ram Shalaka Prashnavali


श्रीरामचरित मानस Ram Charit Manas 

। रामकथा के रसिक तुम, भक्त-राज मति धीर 
आयसु आसान लीजिये प्रभु, तेज पुंज कपिवीर 




"Ramkatha ke rasik tuma, Bhakt-raj mti dheer Aaisu aasan lijiye prabhu, Tej punj Kapiveer"
रामायण कई भाषाओं में लिखी गई : जितनी भाषाओं में रामकथा पाई जाती है, उनकी फेह रिस्त बनाने में ही आप थक जाएंगे- अन्नामी, बाली, बांग्ला, कम्बोडियाई, चीनी, गुजराती, जावाई, कन्नड़, कश्मीरी, खोटानी, लाओसी, मलेशियाई, मराठी, ओड़िया, प्राकृत, संस्कृत, संथाली, सिंहली, तमिल, तेलुगु, थाई, तिब्बती, कावी आदि हजारों भाषाओं में उस काल में और उसके बाद कृष्ण काल, बौद्ध काल में चरित रामायण में अनुवाद के कारण कई परिवर्तन होते चले गए, लेकिन मूल कथा आज भी वैसी की वैसी ही है।


अब तक लिखी गई राम कथा की लिस्ट :

1. अध्यात्म रामायण
2. वाल्मीकि की 'रामायण' (संस्कृत)
3. आनंद रामायण
4. 'अद्भुत रामायण' (संस्कृत)
5. रंगनाथ रामायण (तेलुगु)
6. कवयित्री मोल्डा रचित मोल्डा रामायण (तेलुगु)
7. रूइपादकातेणपदी रामायण (उड़िया)
8. रामकेर (कंबोडिया)
9. तुलसीदास की 'रामचरित मानस' (अव‍धी)
10. कम्बन की 'इरामावतारम' (तमिल)
11. कुमार दास की 'जानकी हरण' (संस्कृत)
12. मलेराज कथाव (सिंहली)
13. किंरस-पुंस-पा की 'काव्यदर्श' (तिब्बती)
14. रामायण काकावीन (इंडोनेशियाई कावी)
15. हिकायत सेरीराम (मलेशियाई भाषा)
16. रामवत्थु (बर्मा)
17. रामकेर्ति-रिआमकेर (कंपूचिया खमेर)
18. तैरानो यसुयोरी की 'होबुत्सुशू' (जापानी)
19. फ्रलक-फ्रलाम-रामजातक (लाओस)
20. भानुभक्त कृत रामायण (नेपाल)
21. अद्भुत रामायण
22. रामकियेन (थाईलैंड)
23. खोतानी रामायण (तुर्किस्तान)
24. जीवक जातक (मंगोलियाई भाषा)
25. मसीही रामायण (फारसी)
26. शेख सादी मसीह की 'दास्ताने राम व सीता'।
27. महालादिया लाबन (मारनव भाषा, फिलीपींस)
28. दशरथ कथानम (चीन)
29. हनुमन्नाटक (हृदयराम)

अध्‍यात्म रामायण : सर्वप्रथम श्रीराम की कथा भगवान श्री शंकर ने माता पार्वतीजी को सुनाई थी। उस कथा को एक कौवे ने भी सुन लिया। उसी कौवे का पुनर्जन्म कागभुशुण्डि के रूप में हुआ। काकभुशुण्डि को पूर्व जन्म में भगवान शंकर के मुख से सुनी वह रामकथा पूरी की पूरी याद थी। उन्होंने यह कथा अपने शिष्यों को सुनाई। इस प्रकार रामकथा का प्रचार-प्रसार हुआ। भगवान शंकर के मुख से निकली श्रीराम की यह पवित्र कथा 'अध्यात्म रामायण' के नाम से विख्यात है।

काकभुशुण्डि रामायण : लोमश ऋषि के शाप के चलते काकभुशुण्डि कौवा बन गए थे। लोमश ऋषि ने शाप से मु‍क्त होने के लिए उन्हें राम मंत्र और इच्छामृत्यु का वरदान दिया। कौवे के रूप में ही उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया। वाल्मीकि से पहले ही काकभुशुण्डि ने रामायण गिद्धराज गरूड़ को सुना दी थी।


जब रावण के पुत्र मेघनाथ ने श्रीराम से युद्ध करते हुए श्रीराम को नागपाश से बांध दिया था, तब देवर्षि नारद के कहने पर गिद्धराज गरूड़ ने नागपाश के समस्त नागों को खाकर श्रीराम को नागपाश के बंधन से मुक्त कर दिया था। भगवान राम के इस तरह नागपाश में बंध जाने पर श्रीराम के भगवान होने पर गरूड़ को संदेह हो गया। गरूड़ का संदेह दूर करने के लिए देवर्षि नारद उन्हें ब्रह्माजी के पास भेज देते हैं। ब्रह्माजी उनको शंकरजी के पास भेज देते हैं। भगवान शंकर ने भी गरूड़ को उनका संदेह मिटाने के लिए काकभुशुण्डिजी के पास भेज दिया। अंत में काकभुशुण्डिजी ने राम के चरित्र की पवित्र कथा सुनाकर गरूड़ के संदेह को दूर किया।

वैदिक साहित्य के बाद जो रामकथाएं लिखी गईं, उनमें वाल्मीकि रामायण सर्वोपरि है। वाल्मीकि श्रीराम के समकालीन थे और उन्होंने रामायण तब लिखी, जब रावण-वध के बाद राम का राज्याभिषेक हो चुका था। एक दिन वे वन में ऋषि भारद्वाज के साथ घूम रहे थे और उन्होंने एक व्याघ द्वारा क्रौंच पक्षी को मारे जाने की हृदयविदारक घटना देखी और तभी उनके मन से एक श्लोक फूट पड़ा। बस यहीं से इस कथा को लिखने की प्रेरणा मिली।

यह इसी कल्प की कथा है और यही प्रामाणिक है। वाल्मीकिज‍ी ने राम से संबंधित घटनाचक्र को अपने जीवनकाल में स्वयं देखा या सुना था इसलिए उनकी रामायण सत्य के काफी निकट है, लेकिन उनकी रामायण के सिर्फ 6 ही कांड थे। उत्तरकांड को बौद्धकाल में जोड़ा गया। उत्तरकांड क्यों नहीं लिखा वाल्मीकि ने? या उत्तरकांड क्यों जोड़ा गया, यह सवाल अभी भी खोजा जाता है।
अद्भुत रामायण संस्कृत भाषा में रचित 27 सर्गों का काव्य-विशेष है। कहा जाता है कि इस ग्रंथ के प्रणेता भी वाल्मीकि थे। किंतु शोधकर्ताओं के अनुसार इसकी भाषा और रचना से लगता है कि किसी बहुत परवर्ती कवि ने इसका प्रणयन किया है अर्थात अब यह वाल्मीकि कृत नहीं रही। तो क्या वाल्मीकि यह चाहते थे कि मेरी रामायण में विवादित विषय न हो, क्योंकि वे श्रीराम को एक मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में ही स्थापित करना चाहते थे?
वाल्मीकि जी ने जो रामाय‍ण लिखी थी वह तो प्रभु श्रीराम के जीवन के कुछ घास घटनाक्रम की लिखी थी। उन्होंने उनके 14 वर्ष के वनवास का संपूर्ण वर्णन थोड़े ही किया है। यही कारण रहा कि वाल्मीकिजी रामायण में जो कथा नहीं मिलती वह हमें कबंद रामायण (कबंद एक राक्षस का नाम था) और जो कबंद में नहीं मिलती वह हमें अद्भुत रामायण में मिल जाती है और जो अद्भुत में नहीं मिलती है वह हमें आनंद रामायण में मिल जाती है।
राम काल में अनेक रामायणें लिखी गई थीं। ऐसा क्यों? क्योंकि राम के बारे में वाल्मीकिजी जो जानते थे वह उन्होंने लिखी। कबंद, अद्भुत और आनंद रामायण के रचयिता जो जानते थे वह उन्होंने लिखा। वाल्मीकिजी तो अयोध्या पुरी क्षेत्र में रहते थे लेकिन दंडकारण्य में राम के साथ क्या-क्या घटा, यह तो दंडकाराण्य के ऋषि ही जानते हैं। इस तरह रामायण कई होती गईं, लेकिन वाल्मीकिजी रामायण को ही मान्यता मिली, क्योंकि वह रामायण वाल्मीकिजी ने लिखी थी। वाल्मीकिजी उस समय के महान ऋषियों की गिनती में थे।

राम की कथा को वाल्मीकिजी के लिखने के बाद दक्षिण भारतीय लोगों ने अलग तरीके से लिखा। दक्षिण भारतीय लोगों के जीवन में राम का बहुत महत्व है। कर्नाटक और तमिलनाडु में राम ने अपनी सेना का गठन किया था। तमिलनाडु में ही श्रीराम ने रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की स्थापना की थी।
कुछ समय बाद महर्षि वाल्मीकि ने भी 'वाल्मीकि रामायण' लिखी और लिखने के बाद उनके मन में इसे भगवान शंकर को दिखाकर उनको समर्पित करने की इच्छा हुई। वे अपनी रामायण लेकर शिव के धाम कैलाश पर्वत पहुंच गए। वहां उन्होंने हनुमानजी को और उनके द्वारा लिखी गई 'हनुमद रामायण' को देखा। हनुमद रामायण के दर्शन कर वाल्मीकिजी निराश हो गए।
वाल्मीकिजी को निराश देखकर हनुमानजी ने उनसे उनकी निराशा का कारण पूछा तो महर्षि बोले कि उन्होंने बड़े ही कठिन परिश्रम के बाद रामायण लिखी थी लेकिन आपकी रामायण देखकर लगता है कि अब मेरी रामायण उपेक्षित हो जाएगी, क्योंकि आपने जो लिखा है उसके समक्ष मेरी रामायण तो कुछ भी नहीं है।
तब वाल्मीकिजी की चिंता का शमन करते हुए श्री हनुमानजी ने हनुमद रामायण पर्वत शिला को एक कंधे पर उठाया और दूसरे कंधे पर महर्षि वाल्मीकि को बिठाकर समुद्र के पास गए और स्वयं द्वारा की गई रचना को श्रीराम को समर्पित करते हुए समुद्र में समा दिया। तभी से हनुमान द्वारा रची गई हनुमद रामायण उपलब्ध नहीं है।

हनुमद रामायण : शास्त्रों के अनुसार विद्वान लोग कहते हैं कि सर्वप्रथम रामकथा हनुमानजी ने लिखी थी और वह भी एक शिला (चट्टान) पर अपने नाखूनों से लिखी थी। यह रामकथा वाल्मीकिजी की रामायण से भी पहले लिखी गई थी और यह 'हनुमद रामायण' के नाम से प्रसिद्ध है।
यह घटना तब की है जबकि भगवान श्रीराम रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद अयोध्या में राज करने लगते हैं और श्री हनुमानजी हिमालय पर चले जाते हैं। वहां वे अपनी शिव तपस्या के दौरान की एक शिला पर प्रतिदिन अपने नाखून से रामायण की कथा लिखते थे। इस तरह उन्होंने प्रभु श्रीराम की महिमा का उल्लेख करते हुए 'हनुमद रामायण' की रचना की।

पारायण विधि
श्रीरामचरित मानस का विधिपूर्वक पाठ करने से पुर्व श्रीतुलसीदासजी, श्रीवाल्मीकिजी, श्रीशिवजी तथा श्रीहनुमानजी का आवाहन-पूजन करने के पश्चात् तीनों भाइयों सहित श्रीसीतारामजी का आवाहन, षोडशोपचार-पूजन और ध्यान करना चाहिये। तदन्तर पाठ का आरम्भ करना चाहियेः-

आवाहन मन्त्रः
तुलसीक नमस्तुभ्यमिहागच्छ शुचिव्रत। नैर्ऋत्य उपविश्येदं पूजनं प्रतिगृह्यताम्।।१।।
ॐ तुलसीदासाय नमः श्रीवाल्मीक नमस्तुभ्यमिहागच्छ शुभप्रद। उत्तरपूर्वयोर्मध्ये तिष्ठ गृह्णीष्व मेऽर्चनम्।।२।।
ॐ वाल्मीकाय नमः गौरीपते नमस्तुभ्यमिहागच्छ महेश्वर। पूर्वदक्षिणयोर्मध्ये तिष्ठ पूजां गृहाण मे।।३।।
ॐ गौरीपतये नमः श्रीलक्ष्मण नमस्तुभ्यमिहागच्छ सहप्रियः। याम्यभागे समातिष्ठ पूजनं संगृहाण मे।।४।।
ॐ श्रीसपत्नीकाय लक्ष्मणाय नमः श्रीशत्रुघ्न नमस्तुभ्यमिहागच्छ सहप्रियः। पीठस्य पश्चिमे भागे पूजनं स्वीकुरुष्व मे।।५।।
ॐ श्रीसपत्नीकाय शत्रुघ्नाय नमः श्रीभरत नमस्तुभ्यमिहागच्छ सहप्रियः। पीठकस्योत्तरे भागे तिष्ठ पूजां गृहाण मे।।६।।
ॐ श्रीसपत्नीकाय भरताय नमः श्रीहनुमन्नमस्तुभ्यमिहागच्छ कृपानिधे। पूर्वभागे समातिष्ठ पूजनं स्वीकुरु प्रभो।।७।।
ॐ हनुमते नमः अथ प्रधानपूजा च कर्तव्या विधिपूर्वकम्। पुष्पाञ्जलिं गृहीत्वा तु ध्यानं कुर्यात्परस्य च।।८।।

रक्ताम्भोजदलाभिरामनयनं पीताम्बरालंकृतं श्यामांगं द्विभुजं प्रसन्नवदनं श्रीसीतया शोभितम्।
कारुण्यामृतसागरं प्रियगणैर्भ्रात्रादिभिर्भावितं वन्दे विष्णुशिवादिसेव्यमनिशं भक्तेष्टसिद्धिप्रदम्।।९।।
आगच्छ जानकीनाथ जानक्या सह राघव। गृहाण मम पूजां च वायुपुत्रादिभिर्युतः।।१०।।

इत्यावाहनम्
सुवर्णरचितं राम दिव्यास्तरणशोभितम्। आसनं हि मया दत्तं गृहाण मणिचित्रितम्।।११।।

इति षोडशोपचारैः पूजयेत्
ॐ अस्य श्रीमन्मानसरामायणश्रीरामचरितस्य श्रीशिवकाकभुशुण्डियाज्ञवल्क्यगोस्वामीतुलसीदासा ऋषयः श्रीसीतरामो देवता श्रीरामनाम बीजं भवरोगहरी भक्तिः शक्तिः मम नियन्त्रिताशेषविघ्नतया श्रीसीतारामप्रीतिपूर्वकसकलमनोरथसिद्धयर्थं पाठे विनियोगः।

अथाचमनम्
श्रीसीतारामाभ्यां नमः। श्रीरामचन्द्राय नमः।
श्रीरामभद्राय नमः।
इति मन्त्रत्रितयेन आचमनं कुर्यात्। श्रीयुगलबीजमन्त्रेण प्राणायामं कुर्यात्।।

अथ करन्यासः
जग मंगल गुन ग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के।।
अगुंष्ठाभ्यां नमः
राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पापपुंज समुहाहीं।।
तर्जनीभ्यां नमः
राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका।।
मध्यमाभ्यां नमः
उमा दारु जोषित की नाईं। सबहि नचावत रामु गोसाईं।।
अनामिकाभ्यां नमः
सन्मुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।
कनिष्ठिकाभ्यां नमः
मामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रुचिर कर सायक।।
करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः
इति करन्यासः

अथ ह्रदयादिन्यासः
जग मंगल गुन ग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के।।
ह्रदयाय नमः।
राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पापपुंज समुहाहीं।।
शिरसे स्वाहा।
राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका।।
शिखायै वषट्।
उमा दारु जोषित की नाईं। सबहि नचावत रामु गोसाईं।।
कवचाय हुम्
सन्मुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।
नेत्राभ्यां वौषट्
मामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रुचिर कर सायक।।
अस्त्राय फट्
इति ह्रदयादिन्यासः

अथ ध्यानम्
मामवलोकय पंकजलोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन।।
नील तामरस स्याम काम अरि। ह्रदय कंज मकरंद मधुप हरि।।
जातुधान बरुथ बल भंजन। मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन।।
भूसुर ससि नव बृंद बलाहक। असरन सरन दीन जन गाहक।।
भुजबल बिपुल भार महि खंडित। खर दूषन बिराध बध पंडित।।
रावनारि सुखरुप भूपबर। जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर।।
सुजस पुरान बिदित निगमागम। गावत सुर मुनि संत समागम।।
कारुनीक ब्यलीक मद खंडन। सब विधि कुसल कोसला मंडन।।
कलि मल मथन नाम ममताहन। तुलसिदास प्रभु पाहि प्रनत जन।।
इति ध्यानम्


श्री राम शलाका प्रश्नावली

सुप्रबिहोमुसुनुविधि
रुसिसिरेंबसहैमं
सुजसीसुकुधाबेअं
त्यकुजोरिकीहोसंरा
पुसुसीजेसंरेहोनि
चितु
कामामिमीम्हाजाहुहींजू
तारारेरीह्रकाखाजिरापू
निकोमिगोनेमनि
हिरारिखिजिमनिजं
सिंमुकौमिधुसुका
गुनितीरि
नापुढाकातूनु
सिसुम्हाराहिं
सालाधीरीजाहूहींषाजूरारे



विधि-श्रीरामचन्द्रजी का ध्यान कर अपने प्रश्न को मन में दोहरायें। फिर ऊपर दी गई सारणी में से किसी एक अक्षर अंगुली रखें। अब उससे अगले अक्षर से क्रमशः नौवां अक्षर लिखते जायें जब तक पुनः उसी जगह नहीं पहुँच जायें। इस प्रकार एक चौपाई बनेगी, जो अभीष्ट प्रश्न का उत्तर होगी।

सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।
यह चौपाई बालकाण्ड में श्रीसीताजी के गौरीपूजन के प्रसंग में है। गौरीजी ने श्रीसीताजी को आशीर्वाद दिया है।
फलः- प्रश्नकर्त्ता का प्रश्न उत्तम है, कार्य सिद्ध होगा।

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा। हृदय राखि कोसलपुर राजा।
यह चौपाई सुन्दरकाण्ड में हनुमानजी के लंका में प्रवेश करने के समय की है।
फलः-भगवान् का स्मरण करके कार्यारम्भ करो, सफलता मिलेगी।
उघरें अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू।।
यह चौपाई बालकाण्ड के आरम्भ में सत्संग-वर्णन के प्रसंग में है।
फलः-इस कार्य में भलाई नहीं है। कार्य की सफलता में सन्देह है।
बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं।।
यह चौपाई बालकाण्ड के आरम्भ में सत्संग-वर्णन के प्रसंग में है।
फलः-खोटे मनुष्यों का संग छोड़ दो। कार्य की सफलता में सन्देह है।
होइ है सोई जो राम रचि राखा। को करि तरक बढ़ावहिं साषा।।
यह चौपाई बालकाण्डान्तर्गत शिव और पार्वती के संवाद में है।
फलः-कार्य होने में सन्देह है, अतः उसे भगवान् पर छोड़ देना श्रेयष्कर है।
मुद मंगलमय संत समाजू। जिमि जग जंगम तीरथ राजू।।
यह चौपाई बालकाण्ड में संत-समाजरुपी तीर्थ के वर्णन में है।
फलः-प्रश्न उत्तम है। कार्य सिद्ध होगा।
गरल सुधा रिपु करय मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।
यह चौपाई श्रीहनुमान् जी के लंका प्रवेश करने के समय की है।
फलः-प्रश्न बहुत श्रेष्ठ है। कार्य सफल होगा।
बरुन कुबेर सुरेस समीरा। रन सनमुख धरि काह न धीरा।।
यह चौपाई लंकाकाण्ड में रावन की मृत्यु के पश्चात् मन्दोदरी के विलाप के प्रसंग में है।
फलः-कार्य पूर्ण होने में सन्देह है।
सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे। राम लखनु सुनि भए सुखारे।।
यह चौपाई बालकाण्ड पुष्पवाटिका से पुष्प लाने पर विश्वामित्रजी का आशीर्वाद है।
फलः-प्रश्न बहुत उत्तम है। कार्य सिद्ध होगा।





सीता रावण की पुत्री थीं : - 

रामकथा के प्रतिनायक रावण में बहुत से श्रेष्ठ गुण होते हुये भी उसका एक आचरण, उसका एक दोष उसकी सारी अच्छाइयें पर पानी फेर जाता है और उसे सबके रोष और वितृष्णा का पात्र बना देता है। यदि उस पर पर-नारी में रत रहने और सबसे बढ़कर सीता हरण का दोष न होता तो रावण के चरित्र का स्वरूप ही बदल जाता। वास्तवकता यह है कि सीता रावण की पुत्री थी और सीता स्वयंवर से पहले ही वह इस तथ्य से अवगत था।

'जब मै अज्ञान से अपनी कन्या के ही स्वीकार की इच्छा करूं तब मेरी मृत्यु हो."
-अद्भुत रामायण 8-12

रावण की इस स्वीकारोक्ति के अनुसार सीता रावण की पुत्री सिद्ध होती है।अद्धुतरामायण मे ही सीता के आविर्भाव की कथा इस कथन की पुष्टि करती है-

दण्डकारण्य मे गृत्स्मद नामक ब्राह्मण, लक्ष्मी को पुत्री रूप मे पाने की कामना से, प्रतिदिन एक कलश मे कुश के अग्र भाग से मंत्रोच्चारण के साथ दूध की बूँदें डालता था (देवों और असुरों की प्रतिद्वंद्विता शत्रुता में परिणत हो चुकी थी। वे एक दूसरे से आशंकित और भयभीत रहते थे। उत्तरी भारत मे देव-संस्कृति की प्रधानता थी। ऋषि-मुनि असुरों के विनाश हेतु राजाओं को प्रेरित करते थे और य़ज्ञ आदि आयोजनो मे एकत्र होकर अपनी संस्कृति के विरोधियों को शक्तिहीन करने के उपाय खोजते थे।ऋषियों के आयोजनो की भनक उनके प्रतिद्वंद्वियों के कानों मे पडती रहती थी,परिणामस्वरूप पारस्परिक विद्वेष और बढ जाता था)।एक दिन उसकी अनुपस्थिति मे रावण वहाँ पहुँचा और ऋषियों को तेजहत करने के लिये उन्हें घायल कर उनका रक्त उसी कलश मे एकत्र कर लंका ले गया।कलश को उसने मंदोदरी के संरक्षण मे दे दिया-यह कह कर कि यह तीक्ष्ण विष है,सावधानी से रखे।

कुछ समय पश्चात् रावण विहार करने सह्याद्रि पर्वत पर चला गया।रावण की उपेक्षा से खिन्न होकर मन्दोदरी ने मृत्यु के वरण हेतु उस कलश का पदार्थ पी लिया।लक्ष्मी के आधारभूत दूध से मिश्रित होने के कारण उसका प्रभाव पडा।मन्दोदरी मे गर्भ के लक्षण प्रकट होने लगे। अनिष्ठ की आशंकाओं से भीत मंदोदरी ने,कुरुश्क्षेत्र जाकर उस भ्रूण को धरती मे गाड दिया और सरस्वती नदी मे स्नान कर चली आई।

हिन्दी के प्रथम थिसारस(अरविन्द कुमार और कुसुम कुमार द्वारा रचित) मे भी सीता को रावण की पुत्री के रूप मे मान्यता मिली है।

रामेश्वर में शिव स्थापना के समय पत्नी-वंचित राम का अनुष्ठान पूर्ण करवाने के लिए रावण सीता को लाकर स्वयं उनका पुरोहित बना था। पूजन कार्य पूर्ण होने पर वह सीता को वापस ले गया। ये सारे प्रसंग कंब रामायण में मिलते हैं।

अद्भुतरामायण मे सीता को सर्वोपरि शक्ति बताया गया है,जिसके बिना राम कुछ करने मे असमर्थ हेंदो अन्य प्रसंग भी इसी की पुष्टि करते हैं :--

(1) रावण-वध के बाद जब चारों दिशाओं से ऋषिगण राम का अभिनन्दन करने आये तो उनकी प्रशंसा करते हुये कहाकि सीतादेवी ने महान् दुख प्राप्त किया है यही स्मरण कर हमारा चित्त उद्वेलित है।सीता हँस पडीं,बोलीं,"हे मुनियों,आपने रावण-वध के प्रति जो कहा वह प्रशंसा परिहास कहलाती है।------ किन्तु उसका वध कुछ प्रशंसा के योग्य नही।"इसके पश्चात् सीता ने सहस्रमुख-रावण का वृत्तान्त सुनाया।अपने शौर्य को प्रमाणित करने के लिये,राम अपने सहयोगियों और सीता सहित पुष्पक मे बैठकर उसे जीतने चले।

सहस्रमुख ने वायव्य-बाण से राम-सीता के अतिरिक्त अन्य सब को उन्हीं के स्थान पर पहुँचा दिया।राम के साथ उसका भीषण युद्ध हुआ और राम घायल होकर अचेत हो गये.।तब सीता ने विकटरूप धर कर अट्टहास करते हुये निमिष मात्र मे उसके सहस्र सिर काट कर उसका अंत कर दिया। सीता अत्यन्त कुपित थीं, हा-हाकार मच गया।ब्रह्मा ने राम का स्पर्श कर उन्हें स्मृति कराई। वे उठ बैठे। युद्ध-क्षेत्र मे नर्तित प्रयंकरी महाकाली को देख वे कंपित हो उठे।ब्रह्मा ने स्पष्ट किया कि राम सीता के बिना कुछ भी करने मे असमर्थ हैं।(वास्तव में ही सीता-परत्याग के पश्चात् राम का तेज कुण्ठित हो जाता है। भक्तजन भी के बाद के जीवन की चर्चा नहीं करते। वास्तविक सीता के स्थान पर स्वर्ण-मूर्ति रख ली जाती है, वनवासी पुत्रों से उनकी विशाल वाहिनी हार जाती है।रामराज्य का कथित चक्रवर्तित्व समाप्त और चारों भाइयों के आठों पुत्रों में राज्य वितरण, जैसे पुराने युग का समापन हो रहा हो।)राम ने सहस्र-नाम से उनकी स्तुति की,जानकी ने सौम्य रूप धारण किया:राम के माँगे हुये दो वर प्रदान किये और अंत मे बोलीं,"इस रूप मे सै मानस के उत्तर भाग मे निवास करूँगी।" और इस उत्तर भाग मे राम-भक्तों की रुचि दिखाई नहीं देती।

राम की प्रशंसा पर सीता के हँसने का प्रसंग भिन्न रूपों मे वर्णित हुआ है।उडिया भाषा की 'विनंका रामायण' मे सहस्रशिरा के वध के लिये, देवताओं ने खल और दुर्बल का सहयोग लेकर सीता और राम के कण्ठों मे निवास करने को कहा था (विलंका रामायण पृ.52,छन्द 2240)

(2) आनन्द रामायण (राज्यकाण्ड,पूर्वार्द्ध,अध्याय 5-6)---------

विभीषण अपनी पत्नी और मंत्रियों के साथ दौडते हुये राम की सभा में आते हैं,और बताते हैं कि कुंभकर्ण के मूल-नक्षत्र मे उत्पन्न हुए पुत्र (जिसे वन मे छोड दिया गया था) मूलकासुर ने लंका पर धावा बोला हैऔर वह भेदिये विभीषण और अपने पिता का घात करनेगाले राम को भी मार डालेगा।

राम ससैन्य गये। सात दिनो तक भीषण युद्ध हुआ पर कोई परिणाम नहीं निकला।तब ब्रह्मा जी के कहने पर कि सीता ही इसके वध मे समर्थ हैं,सीता को बुलाया गया।उनके शरीर से निकली तामसी शक्ति ने चंण्डिकास्त्र से मूलकासुर का संहार किया।

दोनो ही प्रसंगों के अनुसार सीता राम की अनुगामिनी या छाया मात्र न होकर समर्थ,विवेकशीला और तेजस्विनी नारी हैं।वे अपने निर्णय स्वयं लेती हैं।स्वयं निर्णय लेने का आभास तो तुलसी कृत रामचरित-मानस मे भी है जहाँ वे वन-गमन के समय अपने निश्चय पर अ़टल रहती हैं और अपने तर्कों से अपनी बात का औचित्य सिद्ध करती हैं।लक्ष्मण रेखा पार करने का प्रकरण भी अपने विवेक के अनुसार व्यवहार करने की बात स्पष्ट करता है।

वाल्मीकि रामायण मे सीता प्रखर बुद्धि संपन्न होने के साथ स्वाभिमानी, निर्भय और स्पष्ट-वक्ता है। अयोध्याकाण्ड के तीसवें सर्ग मे जब राम उन्हें वन ले जाने से विरत करते हैं तो वे आक्षेप करती हुई कहती हैं,"मेरे पिता ने आपको जामाता के रूप मे पाकर क्या कभी यह भी समझा था कि आप शरीर से ही पुरुष हैं, कर्यकलाप से तो स्त्री ही हैं। ..जिसके कारण आपका राज्याभिषेक रोक दिया गया उसकी वशवर्ती और आज्ञापालक बन कर मै नहीं रहूँगी", "अरण्य-काण्ड के दशम् सर्ग मे जब राम दण्डक वन को राक्षसों से मुक्त करने का निर्णय करते हैं वह राम को सावधान करती हैं कि दूसरे के प्राणों की हिंसा लोग बिना बैर-विरोध के मोह वश करते हैं,वही दोष आपके सामने उपस्थित है। एक उदाहरण देकर उन्होने राम से कहा मै आपको शिक्षा देती हूँ कि धनुष लेकर बिना बैर के ही दण्कारण्यवासी राक्षसों के वध का विचार नहीं करना चाहिये। बिना अपराध के किसी को मारना संसार के लोग अच्छा नहीं समझेंगे। वे यह भी कहती हैं कि राज्य त्याग कर वन मे आ जाने पर यदि आप मुनि- वृत्ति से ही रहें तो इससे मेरे सास-श्वसुर को अक्षय प्रसन्नता होगी। हम लोगों को देश-धर्म का आदर करना चाहिये।कहाँ शस्त्र-धारण और कहाँ वनवास!हम तपोवन मे निवास करते हैं इसलिये यहाँ के अहिंसा धर्म का पालन करना हमारा कर्तव्य है। आगे यह भी कहती हैं कि आप इस विषय मे अपने छोटे भाई के साथ बुद्धिपूर्वक विचार कर लें फिर आपको जो उचित लगे वही करें। दूसरी ओर राम यह मान कर चलते हैं कि सारी पृथ्वी इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियों की है, इसलिये वे सबको दण्ड देने के अधिकारी हैं(वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धा काण्ड,18 सर्ग मे ),जब कि उत्तरी भारत में ही अनेक स्वतंत्र राज्यों का उल्लेख रामायण में ही मिल जाता है।

'दक्षिण के प्रसिद्ध विद्वान इलयावुलूरि पाण्डुरंग राव, जिन्होने तेलुगु, हिन्दी और अंग्रेजी मे लगभग 500 कृतियों का प्रणयन किया है, ,और जो तुलनात्मक भरतीय साहित्य,दर्सन और भारतीय भाषाओं मे राम-कथा साहित्य के विशेष अध्येता हैं, का मत भी इस संबंध मे उल्लेखनीय है।अपनी 'वाल्मीकि 'नामक पुस्तक मे उन्होने सीता को उच्चतर नैतिक शिखरों पर प्रतिष्ठित करते हुये कहा है, -'राम इस विषय मे अपनी पति-परायणा पत्नी के साथ न्याय नहीं कर सके........वे अपनी दणडनीति मे थोडा समझौता तो कर ही सकते थे.क्योंकि उनकी पत्नी गर्भवती है,और अयोध्या के भावी नरेश(नरेशों ) को जन्म देनेवाली है। कारण कुछ भी हो साध्वी, तपस्विनी सीता पर जो कुछ बीता वह सबके लिये अशोभनीय है। "(वाल्मीकि-पृष्ठ 49)

वन-वास हेतु प्रस्थान के समय जब कौशल्या सीता को पतिव्रत- धर्म का उपदेश देती हैं तो सीता उन्हें आश्वस्त करती हुई कहती हैं, 'स्वामी के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये यह मुझे भली प्रकार विदित है। पूजनीया माताजी, आपको मुझे असती के समान नहीं मानना चाहिये । .....मैने श्रेष्ठ स्त्रियों माता आदि के मुख से नारी के सामान्य और विशेष धर्मों का श्रवण किया है।

सामने आनेवाली हर चुनौती को सीता स्वीकार करती है। जब विराध राम-लक्षमण के तीरों से घायल हो कर सीता को छोड उन दोनो को उठा कर भागने लगता है तो वे बिना घबराये साहस पूर्वक सामने आ कर उसे नमस्कार कर राक्षसोत्तम कह कर संबोधित करती हैं और उन दोनो को छोड कर स्वयं को ले जाने को कहती हैं। राज परिवार मे पली सुकुमार युवा नारी मे इतना विश्वास,साहस धैर्य और स्थिरता उनके विरल व्यक्तित्व की द्योतक है। हनुमान ने भी सीता को अदीनभाषिणी कहा है। वह राम से भी दया की याचना नहीं करती, केवल न्याय माँगती है, जो उन्हे नहीं मिलता।

सीता के चरित्र पर संदेह करते हुये, अंतिम प्रहार के रूप मे, राम ने यहाँ तक कह डाला कि तुम लक्ष्मण, भरत, सुग्रीव, विभीषण जिसका चाहो वरण कर सकती हो। सीता तो सीता, उन चारों को, जो सीता और राम-सीता के प्रति पूज्य भाव रखते थे, ये वचन कैसे लगे होंगे !वाल्मीकि की सीता ने उत्तर दिया था,"यदि मेरे संबंध मे इतना ही निकृष्ट विचार था तो हनुमान द्वारा इसका संकेत भर करवा देते ...।"आगे उन्होने कहा, "आप ऐसी कठोर, अनुचित, कर्ण-कटु और रूखी बात मुझे क्यों सुना रहे हैं ?जैसे कोई निम्न श्रेणी का पुरुष, निम्न श्रेणी की स्त्री से न कहने योग्य बातें भी कह डालता है ऐसे ही आप भी मुझसे कह रहे हैं। ..नीच श्रेणी की स्त्रियों का आचरण देख कर यदि आप समूची स्त्री जाति पर ही सन्देह करते हैं तो यह उचित नहीं है।आपने ओछे मनुष्यों की भाँति केवल रोष का ही अनुसरण करके, मेरे शील-स्वभाव का विचार छोड केवल निम्न कोटि की स्त्रियों के स्वभाव को ही अपने सामने रखा है(युद्ध-काणड,116 सर्ग)।"

पति-पत्नी का संबंध अंतरंग और पारस्परिक विश्वास पर आधारित है। सीता की अग्नि-परीक्षा लेने और वरुण,यम, इन्द्र ब्रह्मा और स्वयं अपने पिता राजा दशरथ के प्रकट होकर राम को आश्वस्त करने के बाद भी, वे प्रजाजनो के सम्मुख सत्य को क्यों नही प्रस्तुत कर पाते ?राम अगर सीता द्वारा अग्नि-परीक्षा दी जाने की बात बता देते तो सारी प्रजा निस्संशय होकर स्वीकार कर लेती, उसी प्रकार जैसे राम के पुत्रों को सहज ही स्वीकार कर लिया था।

राजा दशरथ तो स्वयं खिन्न हैं। वे सीता को पुत्री कह कर सम्बोधित करते हैं और कहते हैं कि वह इस व्यवहार के लिये राम पर कुपित न हो। उन्हें अनुमान भी नहीं होगा निर्दोषिता सिद्ध होने के बाद भी सीता को दंडित किया जायेगा और फिर उन्हें इस स्थिति से गुजरना होगा। राम सदा परीक्षा , प्रमाण और शपथ दिलाते रहे, और विपत्ति के समय सीता अकेला छोड दिया गया। चरम सीमा तब आ गई जब उन्होने देश-देश के राजाओं, मुनियों और समाज के प्रत्येक वर्ग के लिये घोषणा करवा दी कि जिसे सीता का शपथ लेना देखना हो उपस्थित हो। उस विशालजन-समूह के सामने सीता को वाल्मीकि द्वारा आश्रम से बुलवाकर उपस्थित किया जाता है(वाल्मीकि रमायण)। दो युवा पुत्रों की वयोवृद्ध माता, जिसका परित्यक्त जीवन, वन मे पुत्रों को जन्म देकर समर्थ और योग्य बनाने की तपस्या मे बीता हो, ऐसी स्थिति मे डाले जाने पर धरती मे ही तो समा जाना चाहेगी। वाल्मीकि ने नारी मनोविज्ञान का सुन्दर निर्वाह किया है। सब कुछ जानते हुए भी पति पत्नी को विषम स्थितियों से जूझने के लिये अकेला छोड, लाँछिता नारी के पति की मानसिकता धारण किये राम विचलत होकरअपने को बचाने के लिये बार-बार समाज के सामने मिथ्या आरोंपों का,दुर्वचनों, शंकाओं का और कुतर्कों की भाषा बोलने लगे किन्तु अविचलत रह कर सीता ने सबका सामना करते हुये जिस प्रकार व्यवहार किया उससे उनकी गरिमा और बढ़ती है। प्रश्न यह है कि राम अपने इस आचरण से भारतीय संस्कृति के कौन से मान स्थापित कर सके  ?

जनता को सत्य बता कर उचित व्यवहार करने से यह गलत सन्देश लोक को न मिलता कि पत्नी पर पति का अपरमित अधिकार है और पत्नी का कर्तव्य है सदा दीन रह कर आज्ञा का पालन .!राम के इस व्यवहार ने भारतीय मानसिकता को इतना प्रभावित कर दिया कि चरित्रहीन, क्रूर और अन्यायी पति भी पत्नी में सीता का आदर्श चाहते हैं एक बार सीता के सामने आकर राम अपनी स्थिति तो स्पष्ट कर ही सकते थे। सीता को लेकर स्वयं वन भी जा सकते थे, राज्य को सँभालने के लिये तीनो भाई थे ही, संतान उत्पन्न होने तक ही साथ दे देते,बच्चे तो उनके ही थे  !

अयोध्या काण्ड के बीसवें सर्ग मे कौशल्या की स्थिति भी इसी प्रकार चित्रित की गई है।जब पुत्र को वनवास दे दिया गया है, वे चुप नहीं रह पातीं, कहती हैं, 'पति की ओर से भी मुझे अत्यंत तिरस्कार और कडी झटकार ही मिली है। मै कैकेयी की दासियों के बराबर या उससे भी गई-बाती समझी जाती हूँ। ...पति के शासन-काल मे एक ज्येष्ठ पत्नी को जो कल्याण या सुख मिलना चाहिये वह मुझे कभी नहीं मिला।

वन-गमन के लिये जब राम अपनी माताओं से बिदा लेने जाते हैं तब रनिवास मे दशरथ की 350 और पत्नियाँ हैं(वाल्मीकि रामायण,अयोध्या काण्ड 39 सर्ग)

शूर्पनखा(चन्द्रनखा ) के साथ उनका जो व्यवहार रहा उसे नीति की दृष्ट से शोभनीय नहीं कहा जा सकता। कालकेयों सेयुद्ध करते समय रावण ने प्रमादवश अपनी बहन शूर्पनखा के पति विद्युत्जिह्व का भी वध कर दिया। जब बहिन ने उसे धिक्कारा तो पश्चाताप करते हुये रावण ने उसे उसे संतुष्ट करने को दण्डकारण्य का शासन देकर खर -दूषण को उसकी आज्ञा में रहने के लिये नियुक्त कर दिया (वाल्मीकि रामायण, उत्तर खण्ड -24सर्ग)।वह विधवा थी और यौवन संपन्न थी। अपने क्षेत्र में दो शोभन पुरुषों को देख कर उसने प्रणय-निवेदन किया। उसका आचरण रक्ष संस्कृति के अनुसार ही था।पर जिस संस्कृति और आचरण में राम पले थे उसमें एक नारी का आगे बढ कर प्रेम-निवेदन करना उनके गले से नहीं उतरा। उन्होंने उसे विनोद का साधन बना लिया।उपहास करते हुये दोनों भाई मज़ा लेते हैं।एक -दूसरे के पास भेजते हुये राम-लक्ष्मण जिस प्रकार उसकी हँसी उड़ाते हैं और अप शब्द कहते हैं उससे वह क्रोधित हो उठती है। राम लक्ष्मण से उसके नाक-कान कटवा देते हैं। इलयावुलूरि पाण्डुरंग राव का कथन है-शूर्पनखा में भी गरिमा और गौरव का अभाव नहीं है। कमी उसमे केवल यही है कि राम-लक्ष्मण के परिहास को वह सही परिप्रेक्ष्य में समझ नहीं पाती। बेचारी महिला दोनों राजकुमारों में से एक को अपना पति बनाने का दयनीय प्रयास करते हुये कभी इधर और कभी उधऱ जाकर हास्यास्पद बन जाती है। अंततः सारा काण्ड उसकी अवमानना में परिणत हो जाता है (वाल्मीकि पृ.75)।

ताटका के प्रसंग मे भी देखने को मिलता है कि राम के साथ उसका कोई विरोध नहीं था य़वह राक्षसी न होकर यक्षी थी। उसके पिता सुकेतु यक्ष बडे पराक्रमी और सदाचारी थे। संतान प्राप्ति के लिये उन्होंने घोर तपस्या की। बृह्मा जी ने प्रसन्न होकर उन्हे एक हजार हाथियों के बल वाली कन्या की प्राप्ति का वर(या प्रछन्न शाप?) दिया, वही ताटका थी। अगस्त्य मुनि ने उसके दुर्जय पुत्र मारीच को राक्षस होने का शाप दिया और उसके पति सुन्द को शाप देकर मार दिया। तब वह अगस्त्य मुनि के प्रति बैर-भाव रखने लगी .और उन्होंने उसे भी नर-भक्षी होने का शाप दे दिया था (बालकाण्ड, 25 सर्ग)।पता नहीं, तपस्वी होकर भी ऋषि-मुनियों में इतना अहं क्यों था कि अपनी अवमानना की संभावना से ही, बिना वस्तुस्थिति या परिस्थिति का विचार किये शाप दे देते थे। शकुन्तला, लक्ष्मण, और भी बहुत से लोग अकारण दण्डत होते रहे। इसी प्रकार की एक कथा सौदास ब्राह्मण की है।शिव के आराधन मे लीन होने के कारण, उसने अपने गुरु को उठ कर प्रणाम नहीं किया तो उसे भी राक्षस होने का शाप मिला, ऐसा भयानक राक्षस जो निरंतर भूख-प्यास से पीडित रह कर साँप, बिच्छू, वनचर और नर-माँस का भक्षण करे।

वाल्मीकि रामायम के उत्तर काण्ड, एकादश सर्ग मे उल्लेख है कि पहले समुद्रों सहित सारी पृथ्वी दैत्यों के अधिकार मे थी।विष्णु ने युद्ध मे दैत्यों को मार कर इस पर आधिपत्य स्थापित कियाथा।ब्रह्मा की तीसरी पीढी मे उत्पन्न विश्रवा का पुत्र दशग्रीव बडा पराक्रमी और परम तपस्वी था।विष्णु के भय से पीडित अपना लंका-निवास छोड कर रसातल को भागे राक्षस कुल का रावण ने उद्धार किया और लंका को पुनः प्राप्त किया।सुन्दर काण्ड के दशम् सर्ग मे उल्लेख है कि हनुमान ने राक्षस राज रावण को तपते हुये सूर्य के समान तेज और बल से संपन्न देखा। रावण स्वरूपवान था। हनुमान विचार करते हैं, 'अहा इस राक्षस राज का स्वरूप कैसा अद्भु है!कैसा अनोखा धैर्य है, कैसी अनुपम शक्ति है और कैसा आश्चर्यजनक तेज है !यह संपूर्ण राजोचित लक्षणों से युक्त है। '

सुन्दर स्त्रियों से घिरा रावण कान्तिवान नक्षत्रपति चन्द्रमा के समान शोभा पा रहा था। राजर्षियों,ब्रह्मर्षियों,दैत्यों, गंधर्वों और राक्षसों की कन्यायें स्वेच्छा से उसके वशीभूत हो उसकी पत्नियाँ बनी थीं। वहाँ कोई ऐसी स्त्री नहीं थी, जिसे बल पराक्रम से संपन्न होने पर भी रावण उसकी इच्छा के विरुद्ध हर लाया हो। वे सब उसे अपने अलौकिक गुणों से ही उपलब्ध हुई थीं। उसकी अंग-कान्ति मेघ के समान श्याम थी।शयनागार मे सोते हुये रावण के एक मुख और दो बाहुओं का ही उल्लेख है। श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न रावण परम तपस्वी, ज्ञान-विज्ञान मे निष्णात कलाओं का मर्मज्ञ और श्रेष्ठ संगीतकार था उसके विलक्षण व्यक्तित्व के कारण ही, उसकी मृत्यु के समय राम ने लक्ष्मण को उसके समीप शिक्षा लेने भेजा था।, यह उल्लेख भी बहुत कम रचनाकारों ने किया है। ।उसके द्वारा रचित स्तोत्रो में उसके भक्ति और निष्ठा पूर्ण हृदय की झलक मिलती है। चिकित्सा-क्षेत्र मे भी उसकी विलक्षण गति थी।

रामायण के अनुसार रावण ने कभी सीता को पाने का प्रयत्न नहीं किया मानस में धनुष-यज्ञ में वह उपस्थित था पर उसने धनुष को हाथ नहीं लगाया। दोनों ही महाकाव्यों में वह सीता के समीप अकेले नहीं अपनी रानियों के साथ जाता है। यह उल्लेख भी है कि रावण ने सीता को इस प्रकार रखा जैसे पुत्र अपनी माता को रखता है। इस उल्लेख से रावण की भावना ध्वनित है। वाल्मीकि रामायण के 'सुन्दरकाण्ड' में वर्णित है कि रात्रि के पिछले प्रहर में छहों अंगों सहित वेदों के विद्वानऔर श्रेष्ठ यज्ञों को करनेवालों के कंठों की वेदपाठ-ध्वनि गूँजने लगती थी। इससे लंका के वातावरण का आभास मिलता है।

मन्दोदरी का मनोहर रूप और कान्ति देख, हनुमान उन्हें भ्रमवश सीता समझ बैठे थे। सीता और मन्दोदरी की इस समानता के पीछे महाकवि का कोई गूढ़ संकेतार्थ निहित है। हनुमान ने राम से कहा था, 'सीता जो स्वयं रावण को नहीं मार डालती हैं इससे जान पडता है कि दशमुख रावण महात्मा है, तपोबल से संपन्न होने के कारण शाप के अयोग्य है। ' वाल्मीकि ने रावण को रूप-तेज से संपन्न बताते हुये उसके तेज से तिरस्कृत होकर हनुमान को पत्तों में छिपते हुये बताया है।

'रक्ष' नामकरण के पीछे भी एक कथा है -समुद्रगत जल की सृष्टि करने के उपरांत ब्रह्मा ने सृष्टि के जीवों से उसका रक्षण करने को कहा। कुछ जीवों ने कहा हम इसका रक्षण करेंगे, वे रक्ष कहलाये और कुछ ने कहा हम इसका यक्षण(पूजन) करेंगे, वे यक्ष कहलाये(वाल्मीकि रामायण, उत्तर काण्ड, सर्ग 4)।कालान्तर में रक्ष शब्द का अर्थह्रास होता गया और अकरणीय कृत्य उसके साथ जुड़ते गये। अत्युक्ति और अतिरंजनापूर्ण वर्णनों ने उसे ऐसा रूप दे दिया क लोक मान्यता में वह दुष्टता और भयावहता का प्रतीक बन बैठा।

मय दानव की हेमा अप्सरा से उत्पन्न पुत्री मन्दोदरी से रावण ने विवाह किया था। मन्दोदरी की बड़ी बहिन का नाम माया था। अमेरिका की 'मायन कल्चर 'का मय दानव और उसकी पुत्री माया से संबद्धता,तथा रक्षसंस्कृति और 'मय संस्कृति' के अदुभुत साम्य को देख कर दोनों की अभिन्नता बहुत संभव लगती है। वहाँ की आश्चर्यजनक नगर-योजना.और विलक्षण भवन निर्माण कला इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

'मायन कल्चर' की नगर व्यवस्था, प्रतीक-चिह्न, वेश-भूषा आदि लंका के वर्णन से बहुत मेल खाते है। मय दानव ने ही लंका पुरी का निर्माण किया था। उनकी जीवन- पद्धति और मान्यताओं मे भी काफी-कुछ समानतायें है।रक्ष ही नहीं उसका स्वरूप भारतीय संस्कृति से भी साम्य रखता है। मीलों ऊँचे कगारों के बीच बहती कलऋता (कोलरेडो) नदी और ग्रैण्ड केनियन की दृष्यावली इस धरती की वास्तविकतायें हैं। संभव है यही वह पाताल पुरी हो जहाँ दानवों को निवास प्राप्त हुआ था।

तमिल भाषा की कंब रामायण मे उल्लेख हुआ है कि मन्दोदरी रावण की मृत्यु से पूर्व ही उसकी छाती पर रोती हुई मर गई,वह विधवा और राम की कृपाकाँक्षिणी नहीं हुई।वहाँ यह भी उल्लेख है कि रावण ने सीता को पर्णकुटी सहित पञ्चवटी से उठा लिया,उसका स्पर्श नहीं किया।रामेश्वर मे शिव स्थापना के समय विपन्न और पत्नी-वंचित राम का अनुष्ठान पूर्ण करवाने,रावण सीता को लाकर स्वयं उनका पुरोहित बना था। कार्य पूर्ण होने पर वह सीता को वापस ले गया। ये सारे प्रसंग सुविदित हैं।कदम्बिनी के मई2002 के अंक के एक लेख में रावण का राम के पुरोहित बनने का उल्लेख है। रावण के पौरुष, पाण्डित्य,परम शिव-भक्त विद्याओं, कलाओं नीति,आदि का मर्मज्ञ

प्राकृत के राम-काव्य 'पउम चरिय ' और संस्कृत के 'पद्मचरितम्' मे शूर्पनखा का नाम चंद्रनखा है।इन काव्यों मे भी लोकापवाद के भय से राम सीता को त्याग देते हैं।सीता के पुत्रों को युवा होने के पश्चात् परित्याग की घटना सुन कर क्रोध आता है,वे राम पर आक्रमण करते हैं।राम ने अपने जीवन काल मे ही चारों भाइयों के आठों पुत्रों को पृथक्-पृथक् राज्यों का स्वामी बना दिया था।लक्ष्मण ने आज्ञा-भंग का अपराध स्वयं स्वीकार कर जल-समाधि ले ली थी।सीता का जो रूप बाद मे अंकित किया गया,वह इन प्रसंगों से बिल्कुल मेल नहीं खाता। किसी भी रचनाकार ने उन्हे रावण की पुत्री स्वीकार नहीं किया।कारण शायद यह हो कि इससे राम के चरित्र को आघात पहुँचता।नायक की चरित्र-रक्षा के लिये घटनाओं मे फेर-बदल करने से ले कर शापों, विस्मरणों, तथा अन्य असंभाव्य कल्पनाओं का क्रम चल निकला।उसका इतना महिमा-मंडन कि वह अलौकिक लगने लगे और और प्रति नायक का घोर निकृष्ट अंकन।अतिरंजना, चमत्कारोंऔर अति आदर्शों के समावेश ने मानव को देवता बना डाला और भक्ति के आवेश ने कुछ सोचने-विचारने की आवश्यता समाप्त कर दी कि जो है सो बहुत अच्छा।वेदों ने 'चरैवेति चरैवेति' 'कह कर मानव

बुद्धि के सदा सक्रिय रहने की बात कही हैं पर यहाँ जो मान लिया उसे ही अंतिम सत्य कह कर आगे विचार करने से ही इंकार कर दिया जाता है। कान बंद कर वहाँ से चले आओ, आलोचना (निन्दा?) सुनने से ही पाप लगेगा ) आगे विचार करना तो दूर की बात है।भारतीय चिन्ता-धारा अपने खुलेपन के लिये जानी जाती है इसीलिये वह पूर्वाग्रहों से ग्रस्त न रह कर जो विवेक सम्मत है उसे आत्मसात् करती चलती है। फिर यह दुराग्रह क्यों ?लोक में यही सन्देश जाता है कि राम ने रावण द्वारा अपहृत सीता को त्याग दिया। पत्नी की दैहिक शुद्धता की बात उठने पर यही उदाहरण सामने रखा जाता है, जब राम जैसे सामर्थ्यवान तक संदेह के कारण पत्नी का परित्याग कर देते हैं तो हम साधारणजनों की क्या बिसात।

कुछ लोगों मानने को तैयार ही नहीं राम ने सीता का परित्याग किया। ऐसे उल्लेखों को क्षेपक बताया जा रहा है। लेकिन संस्कृत और हिन्दीतर भाषा की रामायणों में राम के पुत्रों के जन्म की जैसी महत्वपूर्ण घटना की चर्चा तक कहीं नहीं मिलती। लंबे समय के बाद रघुकुल में संतान उत्पन्न हुई, राम और सीता जीवन के कितने कठोर अनुभवों से गुज़रने के बाद माता पिता बने यह कोई छोटा अवसर नहीं था। राजभवन में राजा के पुत्र उत्पन्न हो, आनन्द बधाई, मंगल-वाद्य न बजें, कौशल्यादि की प्रसन्नता, रीति -नीति, संस्कार, कहीं कुछ नहीं। प्रजा में कहीं कोई संवाद -सूचना तक नहीं।

अहल्या को पाँव से छू कर उद्धार करने की बात वाल्मीकि रामायण में नहीं है। माता के वयवाली, तपस्विनी ऋषि-पत्नी को पाँव से स्पर्श करना मर्यादा के अंतर्गत नहीं आता, राम स्वयं उनके चरण-स्पर्श कर उन्हें उस मानसिक जड़ता से उबारते और उनकी निर्दोषिता प्रमाणित करते तो उनका चरित्र नई ऊँचाइयों को छू लेता।

जो इस संसार में मानव योनि में जन्मा है, सबसे पहले वह मानव है और मानवता उसका धर्म।जीवन चेतना की अविरल धारा है उसका आकलन भी सारे पूर्वाग्रह छोड़ उसकी समग्रता में करना संतुलत दृष्टि का परिचायक है। जन्म से ही उस पर पुण्यत्मा (ईश्वर होने का )या पापी और नीच होने का ठप्पा लगा कर, उसके हर कार्य को उसी चश्मे से देखना और येन-केन प्रकारेण प्रत्येक कार्य को महिमामण्डित या निन्दित करने से अच्छा यह है कि सहज मानवीय दृष्टि से उसके पूरे जीवन के कार्यों का समग्र लेखा-जोखा करने के बाद ही, उसका मूल्यंकन हो। ईश्वरत्व के सोपान पर अधिष्ठित करना अनुचित नहीं लेकिन मानवीयता की शर्त पूरी करने के बाद। मानवी गुणों का पूर्णोत्कर्ष न कर ईश्वरत्व की ओर छलाँग लगा देने से आदर्श व्यावहारिक नहीं हो सकेंगे।

श्री इलयावुलूरि ने एक बात बहुत पते की कही है -यह विडंबना की बात है क सारा संसार सीता और राम को आदर्श दंपति मान कर उनकी पूजा करता है किन्तु उनके जैसा दाम्पत्य किसी को भी स्वीकार नहीं होगा (वाल्मीकि.संदेश .अंतिम अध्याय)।इसमें एक बात और जोड़ी जा सकती है कि राम जैसा पिता पाने को भी कोई पुत्र शायद ही तैयार हो, और कौशल्या की तरह लाचार, वधू और पौत्रविहीना होकर अकेले वृद्धावस्था बिताने की कामना भी कोई माता नहीं करेगी। अति मर्यादाशील और आज्ञाकारी लक्ष्मण, अपने पूज्य भाई के आदेशानुसार किसी स्त्री के नाक-कान काट कर भले चुप रहें पर पूज्या भाभी को, गर्भावस्था में, बिना किसी तैयारी के, जंगल में अकेला छोड़ कर कैसा अनुभव करते होंगे यह तो वे ही जाने।

                            ॥ श्रीरामरक्षास्तोत्रम् ॥

साधना विधान
चैत्र नवमीं अर्थात् राम नवमीं अथवा किसी भी शुभ मुहूर्त में अपने पूजा स्थान 
में प्रातः उत्तर अथवा पूर्व की ओर मुख कर लाल रंग के आसन पर बैठें, सामने 
श्रीराम का हनुमान सहित चित्र स्थापित हो और इसके पास में गुरुचित्र इसके साथ 
ही एक थाली में स्वास्तिक बनाकर पुष्प और अक्षत का आसन देकर मंत्रसिद्ध प्राण 
प्रतिष्ठायुक्त राम रक्षा वज्र कवच स्थापित करें और कवच पर पुष्प अर्पित करें।

 गुरुचित्र तथा राम के स्वरूप पर माल्यार्पण करें। गुरुचित्र और भगवान श्रीराम 
के चित्र पर कुंकुम से तिलक करें।

भगवान श्री राम के परम भक्त हनुमान जी को तिलक लगायें। स्वयं अपने ललाट पर 
सिन्दूर का तिलक करें तथा एक हनुमान भक्त के रूप में कवच का पूजन सम्पन्न करना है।

पूजन क्रम में सर्वप्रथम गुरु पूजन सम्पन्न करें। दोनों हाथ जोड़कर गुरुदेव  
श्रद्धापूर्वक ध्यान करें –   गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो 
महेश्‍वरः। गुरुः साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥    ध्यान के 
पश्‍चात् गुरु चित्र/विग्रह/ ॐ  guru स्नानम् समर्पयामि॥   इसके पश्‍चात् 
स्वच्छ वस्त्र से पौंछ लें निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुए कुंकुम, अक्षत, 
Guru के स्थान पर अपने अपने गुरु का नाम लें
पुष्प, नैवेद्य, धूप-दीप से पंचोपचार पूजन करें –   ॐ  Guru कुंकुम समर्पयामि। 
ॐ Guru अक्षतान समर्पयामि। ॐ Guru  पुष्पम् समर्पयामि। ॐ Guru नैवेद्यम् 
निवेदयामि। ॐ Guru धूपम् आघ्रापयामि, दीपम् दर्शयामि।    (धूप, दीप दिखाएं)   
अब तीन आचमनी जल गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका पर घुमाकर छोड़ दें। इसके 
पश्‍चात् गुरु माला से गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें –

 गुरु पूजन के पश्‍चात् हनुमान का पंचोपचार पूजन करें और हनुमान पूजन के 
पश्‍चात् भगवान श्रीराम का पूजन नीचे दी गई विधि अनुसार सम्पन्न करें।

 सर्व प्रथम न्यास स्वरूप भगवान श्रीराम के सभी अंगों का पूजन करते हुए भगवान 
श्रीराम के चित्र पर कुंकुम से तिलक करें।

 अंगन्यास
 ॐ श्रीरामचन्द्राय नमः, पादौ पूजयामि। (चरणों)
 ॐ श्रीराजीववलोचनाय नमः, गुल्फौ पूजयामि। (टखनों)
ॐ श्रीरावणाहन्तकाय नमः, जानुनी पूजयामि। (घुटनों)
 ॐ श्रीविश्‍वरूपाय नमः, जङ्घे पूजयामि। (जांघों)
ॐ श्रीवाचस्पतये नमः, उरू पूजयामि। (नितम्ब)
ॐ श्रीलक्ष्मणाग्रजाय नमः, कटिं पूजयामि। (कमर)
ॐ श्रीविश्‍वमित्रप्रियाय नमः, नाभिं पूजयामि। (नाभि)
ॐ श्रीपरमात्मने नमः, हृदयं पूजयामि। (हृदय) ॐ श्रीकण्ठाय नमः, कण्ठं पूजयामि। 
(कण्ठ) ॐ श्रीसर्वास्त्रधारिणे नमः, बाहू पूजयामि। (भुजाओं)
ॐ श्रीरघुद्वहाय नमः, मुखं पूजयामि। (मुख)
 ॐ श्रीपद्मानाभाय नमः, जिह्वां पूजयामि। (जिह्वा)
ॐ श्रीदामोदराय नमः, दन्तान् पूजयामि। (दांतों)
ॐ श्रीसीतापतये नमः, ललाटं पूजयामि। (ललाट)
 ॐ श्रीज्ञानगम्या नमः, शिरः पूजयामि। (सिर) ॐ श्रीसर्वात्मने नमः, सर्वाङ्गं 
पूजयामि। (सभी अंगों)

इसके पश्‍चात् दोनों हाथ जोड़कर ध्यान करें –   श्रीराम गोविन्द मुकुन्द कृष्ण 
श्रीनाथ विष्णो भगवन्नमस्ते। प्रौढारिषड् वर्ग महाभयेभ्यो मां त्राहि नारायण 
विश्वमूर्ते॥ हे श्रीराम, गोविन्द, मुकुन्द, कृष्ण, श्रीनाथ, विष्णो, भगवन्! 
आपको नमस्कार है। हे विश्वमूर्ति – विश्वरूप नारायण! आप काम, क्रोध, मद, मोह, 
लोभ और मत्सर रूपी प्रबल शुत्रओं के भीषण भय से मेरी रक्षा कीजिये।

 ध्यान के पश्‍चात् निम्न मंत्र का एक माला जप करें –   ॥ ॐ रां रामाय नमः॥

मंत्र जप के पश्‍चात् लाल धागे में पिरोकर इस यंत्र को धारण करें तथा हर समय 
इसे धारण किये रहें। यह कवच शिष्य के लिये एक राम वरदान है। जो हर समय उसकी 
रक्षा करता रहता है।   कवच धारण करने के पश्‍चात् साधक को माह में एक बार ‘राम 
रक्षा स्तोत्र’ का पाठ अवश्य ही सम्पन्न करना चाहिए। इस दिव्य स्तोत्र का पाठ 
तो प्रत्येक शिष्य साधक को सम्पन्न करना ही चाहिए।   वास्तव में राम रक्षा कवच 
जीवन का वह वरदान है जो दुर्लभ व्यक्तियों को ही प्राप्त होता है और यह भी 
सत्य है कि यह कवच केवल गुरु कृपा से ही प्राप्त हो सकता है। इसे धारण करने के 
पश्‍चात् कुछ ही दिनों में मुख मण्डल पर एक विशेष ताजगी तथा आभा आ जाती है। 
इसके बारे में अधिक लिखना अनिवार्य नहीं है। यह तो धारण करने के पश्‍चात् ही जा सकते हैं

॥ श्रीरामरक्षास्तोत्रम् ॥

श्रीगणेशायनम: ।

अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य । बुधकौशिक ऋषि: । श्रीसीतारामचंद्रोदेवता । अनुष्टुप् छन्द: सीता शक्ति: । श्रीमद्हनुमान् कीलकम् ।
श्रीसीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ॥

॥ अथ ध्यानम् ॥

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्दद्पद्मासनस्थं ।
पीतं वासोवसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् ॥
वामाङ्कारूढसीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं ।
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचंद्रम् ॥
॥ इति ध्यानम् ॥

चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥१॥
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।
जानकीलक्ष्मणॊपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥२॥
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम् ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥३॥
रामरक्षां पठॆत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।
शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज: ॥४॥

कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥५॥

जिव्हां विद्दानिधि: पातु कण्ठं भरतवंदित: ।
स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक: ॥६॥

करौ सीतापति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित् ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥७॥

सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु: ।
ऊरू रघुत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत् ॥८॥

जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तक: ।
पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोSखिलं वपु: ॥९॥

एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठॆत् ।
स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥१०॥

पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्मचारिण: ।
न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: ॥११॥

रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन् ।
नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥

जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् ।
य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्द्दय: ॥१३॥

वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत् ।
अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम् ॥१४॥

आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर: ।
तथा लिखितवान् प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक: ॥१५॥

आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम् ।
अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान् स न: प्रभु: ॥१६॥

तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥

फलमूलशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥

शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् ।
रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघुत्तमौ ॥१९॥

आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षया शुगनिषङ्ग सङिगनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणा वग्रत: पथि सदैव गच्छताम् ॥२०॥

संनद्ध: कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन्मनोरथोSस्माकं राम: पातु सलक्ष्मण: ॥२१॥

रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येयो रघुत्तम: ॥२२॥

वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम: ।
जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेय पराक्रम: ॥२३॥

इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्भक्त: श्रद्धयान्वित: ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं संप्राप्नोति न संशय: ॥२४॥

रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम् ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर: ॥२५॥

रामं लक्ष्मण पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम् ।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ।

राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम् ।
वन्दे लोकभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ॥२६॥

रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: ॥२७॥

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम ।
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम ।
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥

माता रामो मत्पिता रामचंन्द्र: ।
स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र: ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु ।
नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम् ॥३१॥

लोकाभिरामं रनरङ्गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् !
कारुण्यरूपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥

कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम् ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥३४॥

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम् ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥३५॥

भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम् ।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥३६॥

रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोSस्म्यहम् ।
रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥

इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम् ॥

॥ श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु ॥





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